आख़िरी पाँच मिनट आपके हैं
हर इंटरव्यू एक ही तरह ख़त्म होता है। लैपटॉप बंद होता है और वे पूछते हैं कि आपका कोई सवाल है क्या। पूरे घंटे में सिर्फ़ यही हिस्सा उनके अपने हाथ में होता है, और ज़्यादातर लोग «नहीं, सब कुछ कवर हो गया» कहकर उसे गँवा देते हैं।

ये पाँच मिनट असल में क्या परखते हैं
«कोई सवाल?» पूरे घंटे में समझ की सबसे बड़ी परीक्षा है। जब कोई स्क्रिप्ट सामने न हो, तब आप किस बारे में सोचते हैं। प्रोडक्ट, टीम के काम करने का तरीक़ा, तरक़्क़ी, या फिर कुछ भी नहीं। आपका सवाल यही दिखा देता है।
कोई आपसे नहीं कहता कि इस हिस्से के भी नंबर मिलते हैं, पर मिलते हैं। वे दो चीज़ें पढ़ते हैं: आपकी तैयारी कितनी गहरी थी, और आपको सचमुच किस बात की परवाह है। सिर्फ़ सुविधाओं के बारे में पूछने वाला और यह पूछने वाला कि टीम फ़ैसले कैसे लेती है, स्कोरकार्ड की एक ही पंक्ति में नहीं आते।
«नहीं, आपने सब कुछ बता दिया» सबसे आम जवाब है और सबसे ख़राब भी। इससे सिर्फ़ एक बात निकलती है: इस नौकरी को लेकर आपकी उत्सुकता पचास मिनट में ख़त्म हो गई।
यह उस जगह के बारे में ठोस जानकारी जुटाने का आपका इकलौता मौक़ा भी है, जहाँ आप कई साल बिता सकते हैं। इसे दिखावा मत समझिए। यह अपने फ़ैसले के लिए की गई असली जाँच है।
सबसे अच्छे सवाल इंटरव्यू के भीतर से निकलते हैं
दिन का सबसे मज़बूत सवाल इंटरव्यू में कही गई बात से ही निकलता है: «आपने बताया कि टीम की हाल में री-ऑर्ग हुई है। इस रोल के लिए सबसे बड़ा बदलाव क्या रहा?» इससे साबित होता है कि आपने ध्यान से सुना। और यह उसी बात को आगे बढ़ाता है जो इंटरव्यूअर के लिए पहले से अहम है।
पहले से तैयार सवाल कितना भी अच्छा हो, पिछले चालीस मिनट से उगे सवाल के सामने कमज़ोर पड़ता है। वे बताते हैं कि कोई प्रोजेक्ट दो तिमाही खिसक गया। पूछिए कि पीछे मुड़कर देखने पर उसे रोक क्या रहा था। ऐसा सवाल दिखाता है कि आप सुन रहे थे, और जो सुना उसे समझे भी थे।
पूरे घंटे में उनकी कही दो ऐसी बातें नोट कर लीजिए जो आपको चौंकाएँ, काग़ज़ पर या मन में। वे दो नोट आपकी साथ लाई हर लिस्ट से बेहतर हैं। रटी हुई लिस्ट सिर्फ़ बैकअप है, और तभी काम आती है जब पूरे घंटे में खींचने लायक़ कुछ हाथ न लगा हो।
किससे पूछ रहे हैं, यह क्या पूछ रहे हैं से ज़्यादा मायने रखता है
एक ही सवाल — टीम की सबसे बड़ी अड़चन इस वक़्त क्या है — hiring manager से पूछने पर ठोस जवाब देता है और recruiter से पूछने पर «हम तेज़ी से बढ़ रहे हैं»। यह टालना नहीं है। recruiter को सचमुच पता नहीं होता। अच्छा सवाल ऐसे इंसान पर ख़र्च कीजिए जो उसका जवाब दे ही नहीं सकता, तो दोनों तरफ़ एक अजीब चुप्पी बैठ जाती है, और अंदर झाँकने के गिने-चुने मौक़ों में से एक ज़ाया हो जाता है।
हर दौर से पहले ख़ुद से एक बात पूछिए: इस इंसान के पास ऐसा क्या है जो पूरे loop में और कोई नहीं दे सकता? अपने सवाल इसी लकीर पर बाँटिए।
- Hiring manager। आपके काम का हिसाब उन्हें देना है, इसलिए असली उम्मीद, संसाधन और वह समस्या जिसके लिए आपको लाया जा रहा है, सिर्फ़ वही बता सकते हैं। पहले तीन महीने में क्या हो जाए तो अच्छा माना जाएगा, यह headcount नया है या किसी के जाने से खाली हुआ है, और उनकी लिस्ट पर वह कौन-सी चीज़ है जिसे वे सबसे पहले हटाना चाहते हैं।
- आपके आने वाले साथी, यानी आपके ही स्तर के peers। उन पर नंबर देने का दबाव नहीं होता, इसलिए उनकी बात रोज़मर्रा के सबसे क़रीब होती है। पूछिए कि हफ़्ते में सबसे ज़्यादा वक़्त किस चीज़ में जाता है, पिछला cross-team प्रोजेक्ट असल में कैसे चला, और नए लोग आमतौर पर कहाँ अटकते हैं। आपको प्रक्रिया की असली रगड़ चाहिए, विज़न नहीं।
- Skip-level, यानी आपके मैनेजर के मैनेजर। वे संगठन देखते हैं, आपका दिन नहीं। पूछिए कि कंपनी के भीतर यह टीम किस चीज़ की ज़िम्मेदार है, अगले साल वह दायरा बढ़ेगा या टिका रहेगा, और वे कैसे तय करते हैं कि टीम अच्छा कर रही है। उनसे रोज़मर्रा की बारीकी पूछना ग़लत इंसान से पूछना है।
- Recruiter। प्रक्रिया और उसके आसपास का पूरा ढाँचा उनके हाथ में है। समय पूछिए, कितने दौर बाक़ी हैं, performance cycle और प्रमोशन कैसे चलते हैं, और यह स्तर किस करियर पथ पर बैठता है। ढाँचे के सवालों के लिए सही श्रोता सिर्फ़ वही हैं, और आख़िर में शर्तों की खिड़की भी वही हैं।
- टेक्निकल इंटरव्यूअर, या दूसरे विभाग वाला इंटरव्यूअर। आपसे उनका वास्ता एक ही ख़ास चीज़ पर पड़ेगा। पूछिए कि उस जोड़ की अपनी तरफ़ से देखें तो इस कुर्सी पर बैठा इंसान उन्हें सबसे ज़्यादा कहाँ अटकाता है। इसका जवाब लोग ध्यान से देते हैं, क्योंकि दर्द उनका अपना है।
बैकअप लिस्ट
- «यहाँ जो लोग कमाल करते हैं और जो बस ठीक-ठाक चलते हैं, उनमें फ़र्क़ क्या होता है?» हर इंटरव्यूअर के पास इसका असली जवाब होता है। इससे पता चलता है कि लोगों को यहाँ सचमुच किस पैमाने पर आँका जाता है।
- «इस कुर्सी पर बैठने वाले को पहले तीन महीनों में क्या ठीक कर लेना चाहिए कि आपको लगे, चुनाव सही हुआ?» जॉब डिस्क्रिप्शन को असली उम्मीद में बदलने का इससे तेज़ रास्ता नहीं है।
- «इस वक़्त टीम की सबसे बड़ी अड़चन क्या है — लोग, दिशा, या कुछ और?» जवाब आमतौर पर JD से कहीं ज़्यादा ईमानदार निकलता है।
- «इस रोल की सबसे मुश्किल बात क्या है, जो जॉब डिस्क्रिप्शन में नहीं लिखी?» यह सवाल सामने वाले से ईमानदार जवाब खींच लाता है, और दिखाता है कि आप ईमानदार जवाब सह सकते हैं।
- «टीम यह कैसे तय करती है कि क्या नहीं बनाना है?» प्रोडक्ट और इंजीनियरिंग दौर में कंपनी की संस्कृति समझने का इससे तेज़ तरीक़ा कोई नहीं।
- «आप ख़ुद यहाँ क्यों आए थे, और जिस वजह से टिके हुए हैं वह वही है?» असली बात दूसरा हिस्सा है। बहुत से इंटरव्यूअर वहीं ठिठकते हैं, और फिर कुछ सच्चा कह जाते हैं।
- «पिछले एक साल में इस टीम से कितने लोग गए, और मोटे तौर पर क्यों?» यह पूछने वाले कम होते हैं। एक घंटे में संस्कृति का इससे सख़्त संकेत और कोई नहीं मिलता।
- «एक साल बाद ऐसा क्या हुआ हो कि आपको ख़ुद लगे, इस कुर्सी के लिए सही इंसान चुना था?» यह सवाल इंटरव्यूअर को आपकी कामयाबी में हिस्सेदार बना देता है।
जो हो चुका है, उसके बारे में पूछिए
«यहाँ देर तक काम होता है क्या?» का जवाब हमेशा «प्रोजेक्ट पर निर्भर करता है» ही आएगा। सवाल एक अमूर्त बारंबारता के बारे में है, और किसी भी बारंबारता की सफ़ाई दी जा सकती है। इसके बजाय किसी ऐसी चीज़ के बारे में पूछिए जो हो चुकी है। पिछली बार सब लोग कई हफ़्ते लगातार कब व्यस्त थे? वह दौर कैसा दिखता था? पीछे मुड़कर देखें तो उसकी वजह का कुछ हुआ? या तो आपको एक ठोस क़िस्सा मिलेगा, या वे कोई क़िस्सा निकाल ही नहीं पाएँगे। जानकारी दोनों में है।
काल्पनिक सवाल को भूतकाल में बदल देना इन पाँच मिनटों की सबसे काम की आदत है। «क्या आप work-life balance को अहमियत देते हैं?» मूल्यों का सवाल है, और इसका जवाब कोई ना में नहीं देता। «पिछली तिमाही में किसी ने लंबी छुट्टी ली थी, और तब काम कैसे बँटा?» तथ्य का सवाल है, और इसका जवाब मौक़े पर गढ़ा नहीं जा सकता।
दूसरी अदला-बदली यह है कि «अच्छा है क्या» की जगह «हुआ कैसे» पूछिए। यह मत पूछिए कि टीम में आपस में बनती है या नहीं। पूछिए कि पिछला बड़ा फ़ैसला आख़िर में किसने लिया, और मतभेद होने पर क्या होता है। प्रक्रिया एक बार ज़ुबान पर आ जाए, तो माहौल उसके साथ ही बाहर आ जाता है।
लंबाई के भी नंबर कटते हैं। एक सवाल एक वाक्य में, ज़्यादा से ज़्यादा दो। तीस सेकंड की भूमिका पहले बाँधिए तो अपनी बात पर पहुँचते-पहुँचते इंटरव्यूअर आपका मुद्दा खो चुका होता है, और वह उसी हिस्से का जवाब देता है जिसका जवाब देना सबसे आसान था।
तीन तरह के सवाल जो नहीं पूछने चाहिए
- जिसका जवाब कंपनी की वेबसाइट पर है। ऐसा सवाल बताता है कि तैयारी बिल्कुल नहीं की, और यह घंटे भर के अच्छे जवाबों पर भारी पड़ जाता है।
- शुरुआती दौर में सैलरी, छुट्टी और रिमोट पॉलिसी। ये सवाल जायज़ हैं, पर इनकी जगह रिक्रूटर और ऑफ़र का चरण है, जहाँ वे अपने आप में एक अलग मोलभाव हैं।
- «यहाँ ओवरटाइम कितना होता है?» इसका जवाब ऊपर वाले अड़चन के सवाल के भीतर ही सुनाई दे जाता है। सीधे पूछने पर लगता है कि आप पहुँचने से पहले ही निकलने की योजना बना रहे हैं।
- «क्या मेरे फ़िट को लेकर आपकी कोई चिंता है?» यह सवाल इंटरव्यूअर से आपके ख़िलाफ़ दलील ज़ोर से कहलवा देता है। और यह ठीक उस वक़्त होता है जब वह आपका फ़ीडबैक लिखने वाला है।
जिन सवालों की क़ीमत चुकानी पड़ती है, और क्यों
सवालों की क़ीमत इसलिए नहीं चुकानी पड़ती कि वे नागवार गुज़रते हैं। इसलिए चुकानी पड़ती है कि वे बता देते हैं कि आप खड़े कहाँ हैं।
- «आज मैंने कैसा किया?» इससे इंटरव्यूअर आपके सामने ही आपको नंबर देने की स्थिति में आ जाता है, तो बदले में शिष्टाचार के अलावा कुछ मिल ही नहीं सकता। फ़ीडबैक चाहिए तो बाद में माँगिए। अभी पूछना सामने वाले से एक शालीन झूठ बुलवाना है।
- «इस रोल के लिए आप कितने लोगों पर विचार कर रहे हैं?» आप संभावना पूछ रहे हैं, काम नहीं। सुनने वाले तक यह पहुँचता है कि आप हिसाब लगा रहे हैं कि मेहनत जारी रखनी है या नहीं, न कि आप यह काम करना चाहते हैं।
- «अगले तीन साल में इस उद्योग को लेकर कंपनी का नज़रिया क्या है?» सुनने में भारी लगता है, और इंटरव्यूअर को किसी विश्लेषण रिपोर्ट की तरह बरतता है। इसका कोई ग़लत जवाब नहीं होता, इसलिए इसमें कोई जानकारी भी नहीं होती, और यह वह वक़्त खा जाता है जो किसी असली चीज़ पर लग सकता था।
- लगातार पाँच सवाल, और हर एक को तह तक खींचना। आपका इरादा दिलचस्पी दिखाने का होता है। उन तक पूछताछ पहुँचती है। दो या तीन सवाल, जिनमें से एक को एक परत और गहरे ले जाया जाए, पाँच उथले सवालों से कहीं बेहतर काम करते हैं।
- वह सवाल जो असल में डींग है। «पिछली कंपनी में मैंने फ़लाँ चीज़ शुरू करवाई थी — यहाँ वैसा कुछ चल रहा है क्या?» पहला हिस्सा आपका रेज़्यूमे है और सवाल सिर्फ़ दूसरा हिस्सा है, और लोग यह अनुपात सुन लेते हैं। अनुभव जोड़ना है तो सीधे जोड़िए, सवाल के भीतर छिपाकर नहीं।
- तीसरी बार यह पूछना कि नतीजा कब तक आएगा। पहली बार पेशेवर है, दूसरी बार याद दिलाना है, तीसरी बार घबराहट है — और आख़िरी पाँच मिनट की घबराहट असामान्य रूप से याद रह जाती है। कब और कैसे पीछा करना है, वह अपने आप में अलग विषय है।
उनके जवाब से कंपनी पढ़िए
आप सवाल इसलिए पूछते हैं कि जानकारी साथ ले जा सकें, इसलिए नहीं कि तेज़ दिखें। असली काम तब शुरू होता है जब वे बोलना शुरू करते हैं।
- ठोसपन। अच्छे जवाब में तारीख़ें, घटनाएँ और लोग होते हैं। «पिछली तिमाही हमने दो प्रोजेक्ट बंद किए और सबको retention पर लगा दिया» जानकारी है। «हम यूज़र अनुभव की बहुत परवाह करते हैं» पर्दा है। जो कंपनी घंटे भर सिर्फ़ पर्दा दिखाती है, वह भीतर भी आमतौर पर ऐसे ही बात करती है।
- काल। ध्यान दीजिए कि वे जो हो चुका है उसका वर्णन कर रहे हैं, या जो होने वाला है उसका। वह प्रक्रिया हम बना रहे हैं, नए मैनेजर अगली तिमाही आ रहे हैं, अगले साल इसके लिए एक समर्पित इंसान होगा। एक-दो बार ईमानदारी है। पूरा घंटा भविष्यकाल में बीते तो नौकरी फ़र्श बिछाने की है, फ़र्श पर दौड़ने की नहीं। यह सही नौकरी भी हो सकती है। बस आपको पता होना चाहिए कि आप कौन-सी ले रहे हैं।
- जो लोग जा चुके हैं, उनके बारे में वे कैसे बोलते हैं। turnover के बारे में पूछें तो सुनिए कि वे वजह कहाँ रखते हैं। जो बता सके कि वे लोग कहाँ गए और क्यों, उसका उनसे संपर्क आमतौर पर अब भी है। हर बार «उन्हें बेहतर मौक़े मिल गए» सच भी हो सकता है, और वह भी जो वे कहना नहीं चाहते। एक और सवाल — वह कुर्सी दोबारा भरी गई क्या? — आमतौर पर बात खोल देता है।
- वे शिकायत कैसे करते हैं। स्वस्थ टीम में इंटरव्यूअर एक-दो दिक़्क़तें साफ़ गिना देता है, और फिर बताता है कि उनसे कैसे निपटा जाता है। जिसे कोई समस्या दिखती ही नहीं, वह या तो टीम को जानता नहीं है, या उसे कुछ न कहने को कहा गया है। दोनों नोट करने लायक़ हैं।
- वे अपने मैनेजर के बारे में कैसे बात करते हैं। यह आप पूछ नहीं सकते, इसका इंतज़ार करना पड़ता है। अगर उनके मैनेजर का लिया कोई फ़ैसला बातचीत में अपने आप आ जाए, और उसके साथ वजह भी जुड़ी हो, तो वह लाइन खुली है। अगर पूरे घंटे में किसी का नाम ही न आए, तो शायद आप ऐसी जगह जा रहे हैं जहाँ लोग आपस में ज़्यादा जुड़े नहीं हैं।
- वे पलटकर पूछते हैं या नहीं। अच्छे इंटरव्यूअर अक्सर जवाब में पूछ लेते हैं, «आप यह क्यों पूछ रहे हैं?» यह अच्छा संकेत है। उन्हें फ़र्क़ पड़ता है कि आप क्या जानना चाह रहे हैं, वे एजेंडे का आख़िरी बिंदु निपटा भर नहीं रहे।
जब वे जवाब न दे पाएँ
चुप्पी अपने आप में ख़तरे की घंटी नहीं है। मायने यह रखता है कि जवाब आ क्यों नहीं रहा।
पहली क़िस्म है जानने की स्थिति में ही न होना। recruiter से टीम के तकनीकी क़र्ज़ के बारे में पूछेंगे तो ज़ाहिर है कुछ नहीं आएगा। वही सवाल किसी और के सामने रखिए, और इसे कंपनी के खाते में मत डालिए।
दूसरी क़िस्म है कभी सोचा ही न होना। hiring manager से पूछिए कि पहले तीन महीनों में कामयाबी कैसी दिखती है, और वे ठिठककर मौक़े पर गढ़ना शुरू कर दें, तो आपको पता चल गया कि इस headcount से जुड़ी उम्मीद अभी तय ही नहीं हुई। अंदर जाकर आपका पहला काम उनके लिए उसे तय करना होगा, और जब तक आप वह नहीं करते, आपका प्रदर्शन उस वक़्त की धारणाओं पर आँका जाएगा। इसमें जान नहीं जाती। बस शर्तों की बातचीत में इसे गिन लीजिए।
तीसरी क़िस्म है कतराना, और इसकी पहचान साफ़ है: वे आपका सवाल दोहराते हैं, फिर उससे मिलता-जुलता कोई आसान सवाल उठाकर उसका जवाब दे देते हैं। आपने turnover पूछा और वे बताने लगे कि हाल में उन्होंने कितनी भर्ती की है। इसे मौक़े पर पकड़िए मत, और छोड़िए भी मत। एक बार दूसरे कोने से फिर पूछिए — इस कुर्सी पर पिछला इंसान कितने समय रहा? जो बताना चाहते हैं, वे दूसरी बार बता देते हैं। दूसरी बार भी घुमा दें, तो जवाब आपको मिल चुका है।
एक स्थिति अलग रखिए: इंटरव्यूअर ख़ुद भी नया हो। यह अनुभव का मामला है, संस्कृति का नहीं। सवाल को उस तरफ़ मोड़िए जिसका वे जवाब दे सकें, और पूछिए कि उनका अपना पहला महीना कैसा बीता। अक्सर वह उससे ज़्यादा काम का निकलता है जो आप पूछने चले थे।
नोट्स काम बाद में आते हैं
ख़त्म होने के दस मिनट के भीतर लिख लीजिए कि उन्होंने असल में क्या कहा। धारणाएँ नहीं, ब्योरा: यह कुर्सी कब से ख़ाली है, पिछली तिमाही क्या बंद हुआ, नए मैनेजर कब आ रहे हैं। याददाश्त आपकी सोच से जल्दी छूटती है, और एक हफ़्ते बाद आपको यही लाइनें किसी दूसरी कंपनी के सामने रखनी होंगी।
दो-तीन प्रक्रियाएँ साथ चल रही हों तो एक ही सवाल के जवाब आमने-सामने रखिए। आपने हर कंपनी से पूछा था कि पहले तीन महीने अच्छे कैसे दिखते हैं। तीनों जवाब एक साथ रखने पर साफ़ हो जाता है कि किस कंपनी ने सोच रखा है कि उसे क्या चाहिए। यह बाद में धारणाओं के आधार पर तुलना करने से कहीं भरोसेमंद है।
जो सुना उससे तय हो जाए कि आपको यह नौकरी नहीं चाहिए, तो कमरे में मत दिखाइए और लापरवाही से बात मत समेटिए। प्रक्रिया पूरी कीजिए और शिष्टाचार बनाए रखिए। ऑफ़र मिलने के बाद हटा जा सकता है, और उस वक़्त आपकी स्थिति सबसे अच्छी दिखती है। यह दुनिया आपकी सोच से छोटी है।
उनके कहे एक-दो शब्द ज्यों के त्यों उस नोट में ले जाइए जो आप बाद में भेजेंगे। यह किसी भी शिष्टाचार-भरे वाक्य से बेहतर काम करता है, हालाँकि उस नोट में क्या जाना चाहिए, वह अलग विषय है।
बातचीत कैसे ख़त्म करें
दो या तीन सवाल काफ़ी हैं। पाँच मिनट सिर्फ़ इसलिए मत भरिए कि वे मौजूद हैं।
आख़िर में तीस सेकंड शांति से बोलिए: «आज जो सुना, उसके बाद मेरी दिलचस्पी अंदर आने से ज़्यादा हो गई है। मैं आगे बढ़ना चाहूँगा। आगे की प्रक्रिया क्या है?» बात साफ़ रहती है और गिड़गिड़ाहट भी नहीं आती। उनकी लिखी फ़ाइल का आख़िरी वाक्य आपका होता है, और वे वक़्त पर निकल भी जाते हैं।
गाइड इंटरव्यू में होने वाली बातें बताती है। इंटरव्यू तक आपको रिज़्यूमे पहुँचाता है: अपने शब्दों में लिखें, दस सेकंड में अंग्रेज़ी पेज पाएँ